geeta updesh

Geeta Updesh – जैसे जल में तैरती नाव को तूफान उसके लक्ष्य से दूर धकेल देता है उसी प्रकार
इंद्रिय-सुख मनुष्य की बुद्धि को गलत रास्ते की ओर ले जाता है।

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जीवन में जीवात्मा बाल, युवा और वृद्ध शरीर प्राप्त करती है
वैसे ही जीवात्मा मृत्यु के बाद दूसरा शरीर प्राप्त करती है,
इसलिए मनुष्य को मृत्यु से नहीं घबराना चाहिए।

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गीता उपदेश

केवल कर्म करना ही मनुष्य के वश में है, कर्मफल नहीं इसलिए
तुम कर्मफल की आसक्ति में ना फसो तथा अपने कर्म का त्याग
भी ना करो।

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गीता उपदेश 1

निष्काम कर्म योगी बनो (फल की आसक्ति से असफलता
का भय होता है जिसके कारण कर्म अच्छी तरह से नहीं हो पाता)
निष्काम कर्मयोग को ही कुशलतापूर्वक कर्म करना कहते हैं ।

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गीता उपदेश 2

जिसका मन सुख-दुख से प्रभावित
ना हो जिसके मन से राग, द्वेष, क्रोध
नष्ट हो गया हो वह साधक परमात्मा
को प्राप्त करता है ।

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गीता उपदेश

तुम अपने कर्तव्य का पालन करो क्योंकि कर्म ना

करने से कर्म करना श्रेष्ठ है कर्म ना करने से तेरे

शरीर का निर्वाह भी नहीं होगा 

गीता उपदेश
गीता उपदेश

ज्ञानी मनुष्य मृत और जीवित के लिए शोक नहीं करते  क्योंकि वह 

जानते हैं शरीर नश्वर है और आत्मा अविनाशी !

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केवल साधक अपनी इंद्रियों को वश में रखता है चंचल इंद्रियों
से इच्छा उत्पन्न होती हैं और इच्छा पूरी ना होने पर क्रोध आता है

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पारस्परिक सहयोग विधाता का पहला निर्देश है । समस्त प्राणी अन्न से 

उत्पन्न होते हैं अन्न वृष्टि से, वृष्टि यज्ञ से,यज्ञ कर्म से, कर्म वेदों में 

विहित है और वेद अविनाशी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं ।

Gita Gyan
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श्रेष्ठ मनुष्य जैसा व्यवहार करता है

श्रेष्ठ मनुष्य जैसा व्यवहार करता है लोग भी वैसा ही व्यवहार करते हैं
हे पार्थ ! तीनों लोकों में न तो मेरा कर्तव्य है न पाने योग्य कोई वस्तु
फिर भी मैं कर्म करता हूँ । नहीं तो लोग मेरे दिखाये मार्ग पर कैसे चलेंगे ।

geeta gyan
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जिसने अपने मन को वश में कर लिया है सुख-दुःख, मान-
अपमान में शांत रहता है जिसके लिए मिटटी, पत्थर और सोना
एक समान है वह परमात्मा से युक्त योगी कहलाता है|

Geeta gyan

Shree Ram Stuti | श्री राम स्तुति

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