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shradh kyon manaya jata hai

पितृ पक्ष (श्राद) की पौराणिक कथा

ऐसा कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध में जब कर्ण का निधन हो गया तो उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई, तो उन्हें रोजाना खाने की बजाय खाने के लिए सोना और गहने दिए गए। इस बात से निराश होकर कर्ण की आत्मा ने इंद्र देव से इसका कारण पूछा तब इंद्र ने कर्ण को बताया कि आपने अपने पूरे जीवन में सोने के आभूषणों को दूसरों को दान किया लेकिन कभी भी अपने पूर्वजों को नहीं दिया।

तब कर्ण ने उत्तर दिया कि वह अपने पूर्वजों के बारे में नहीं जानता है। और उसे सुनने के बाद, भगवान इंद्र ने उसे 15 दिनों की अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन दान कर सके। तब से इसी 15 दिन की अवधि को पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है।

पितृ पक्ष (श्राद्ध) कब मनाया जाता है

पितृ पक्ष भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक पितृ पक्ष मनाया है। इस दौरान पितरों को तर्पण और विशेष तिथि को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इस पक्ष में पितृ यमलोक से धरती पर आते हैं और अपने परिवार के आस-पास विचरण करते हैं। श्राद्ध करने से पितरों की तृप्ति के लिए भोजन करवाया जाता है, जिससे उनको शांति मिलती है और आशीर्वाद भी देते हैं। पितरों को आशीर्वाद से घर में सुख-शांति के अलावा आर्थिक समृद्धि भी मजबूत होती है। पितृपक्ष में अगर पितरों का श्राद्ध न करें तो इससे वह नाराज हो जाते हैं।

किस तरह करें श्राद्ध

श्राद्ध को हमेशा दोपहर के समय करना चाहिए, क्योंकि सुबह का समय देवी-देवताओं का होता है। श्राद्ध मृत्यु वाली तिथि ( हिंदी तिथि के अनुसार ) को किया जाता है। श्राद्ध वाले दिन सुबह उठकर घर की अच्छे साफ-सफाई करें और घर के आंगन में रंगोली भी बनाएं। संभव हो तो आप जिस व्यक्ति का श्राद्ध करने वाले हों, उसकी मनपसंद का खाना बनाएं। खाने में लहसुन-प्‍याज का इस्‍तेमाल न करें। ध्यान रहे कि पितरों के लिए किए जाने वाली सभी क्रियाएं जनेऊ दाएं कंधे पर रखकर और दक्षिणाभिमुख होकर की जाती है।

इस मंत्र का जाप करें- *‘ॐ पितृदेवताभ्यो नमः’ काले तिल से करें तर्पण

शास्त्रों के अनुसार, पितरों को भोजन देने से पहले पांच जगह भोजन निकालकर खिलाया जाता है। ये गौ (गाय), श्वान (कुत्ता), काक (कौवा), देवादि, पिपीलिका (चींटी)। पहले इनको तृप्त किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मण को बुलाकर तर्पण और पिंडदान करवाएं, तर्पण हमेशा काले तिल से किया जाता है। फिर ब्राह्मण या फिर कुल के लोगों को बुलाएं और कुश पर बैठाकर भोजन करवाएं। भोजन के बाद पितरों को धन्यवाद दें और जाने-अनजाने हुई गलती के लिए माफी मांगकर दक्षिणा दें। इसके बाद पूरा परिवार एकसाथ बैठकर खाना खाएं।

श्राद्ध की तिथि याद न होने पर क्या करें।

श्रद्धा शब्द से बना है श्राद्ध, श्राद्ध पर्व है पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का पर्व। नई पीढ़ी जान जाये कि उनके पूर्वज कौन थे उनकी श्रद्धा का पर्व। पूर्वजों की पुण्य स्मृति का पर्व, संस्मरणों को पुनः याद करना। अनुपालन-अनुशीलन का पर्व, उनके तर्पण का पर्व, उन्हें याद करना। आस्था और श्रद्धा, वह भी वर्ष में केवल एक बार ही मनाते हैं। आइए स्मरण करें अपने-अपने पूर्वजों को पूर्णिमा को इसलिए मनाते हैं। तिथिविहीन तथा पूर्णिमा को स्वर्गीय हुए पूर्वजों का स्मरण दिवस है। भाद्रपद पूर्णिमा, जो हमें स्मरण नहीं उन सबके श्राद्ध का पर्व दिवस है।

श्राद्ध के दिनों में शुभ कार्य नहीं करने चाहिए

अश्विन मास की प्रतिपदा से अमावस्या तक श्राद्ध-पर्व सनातन पर्व है।प्रत्येक हिंदू घरानों में मनाया जाता है यह श्राद्ध पर्व, भारतीय श्राद्ध पर्व है।।पितरों को जल-अर्पण, भोज-अर्पण, दान-अर्पण श्रद्धा कहलाती है। श्रद्धा का प्रतीक है यह श्राद्ध पर्व, पितरों के प्रति श्रद्धा कहलाती है।।वर्जित रहते हैं शुभ कार्य, विवाह-मुंडन, गृह-प्रवेश आदि शुभ कर्म। शास्त्रोक्त कथन है कि पितर स्वर्ग से उतरकर आते हैं कराने यह शुभ कर्म।।न केवल स्मरण हो आता है पितरों का, अश्विन कृष्ण पक्ष शुभ पक्ष है।शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होते हैं नवरात्र, यह श्राद्ध पर्व से भी शुभ पक्ष है।

पितृ ऋण के लिए करें श्राद्ध

माता- पिता के रज- वीर्य से शरीर बनता है। *माता के दूध से और पिता की कमाए हुए अन्न से शरीर का पालन- पोषण होता है। पिता के धन से शिक्षा एवं योग्यता प्राप्त होती है। माता- पिता के उद्योग से विवाह होता है। इस तरह पुत्र पर माता-पिता का, माता-पिता पर दादा -दादी का और दादा -दादी पर परदादा -परदादी का ऋण रहता है। परंपरा से रहने वाले इस पितृऋण से मुक्त होने के लिए पितरों की सद्गति के लिए उनके नाम से पिंड – पानी देना चाहिए ।

इस वर्ष का अंतिम श्राद सितंबर 25, 2022 रविवार को होगा।

अष्ट लक्ष्मी या आठ प्रकार के धन

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